शनिवार, दिसंबर 15, 2012

हमारे नायक का चेहरा-छवि

दबंग के दूसरे भाग के प्रोमो चैनलों पर दिखाई देने लगे हैं। सर्वमान्य नायक सलमान खान पहले भाग की दबंग के अपने किरदार "चुलबुल पांडे" को अपने निर्देशक भाई अरबाज खान और पटकथा लेखक के जरिए किस तरह से स्थापित करते हैं, इसकी जिज्ञासा दर्शकों में ज्यादा है। "दबंग 2" में सलमान के विरुद्ध "वॉन्टेड" वाले खलनायक प्रकाश राज हैं जिनको हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने उसी फिल्म के "गनी भाई" वाले किरदार में खूब पहचाना था। इधर हिन्दी सिनेमा में सच्चे खलनायक वीरों से भूमि खाली पड़ी है और प्रकाश राज आसानी से उस जमीन में अपना खम्ब गाड़ने में सफल हो रहे हैं। प्रकाश राज एक सॉफ्ट-फेस-स्पोकन प्रभाव वाले विलेन हैं जो अनिल शर्मा की नई फिल्म "सिंह साहेब द ग्रेट" में भी अच्छे रोल के लिए अनुबंधित हैं। सलमान खान हमारे सिनेमा में एक ऐसे नायक को पेश कर रहे हैं जिसका आदर्शवाद उसके द्वारा खुद निजी रूप से गढ़ा हुआ है जिसमें वह बुरे लोगों से अपने ढंग से निबटता है। वह आत्मविश्वास और क्षमताओं के साथ-साथ बहादुरी से भरा हुआ है। वह रोमांटिक है और प्यार करने और जताने का उसका अपना ढंग है। यहां भी उसका अपना शिष्टाचार गजब का है। सलमान और सोनाक्षी की यह केमेस्ट्री दबंग भाग दो में भी बड़े दिलचस्प ढंग से नजर आती है। सलमान का नायक अपनी नायिका चुनता है, बेवजह फ्लर्ट नहीं करता जिसकी कद्र स्त्रियों में कुछ ज्यादा ही है। चौड़े सीने, प्रभावित करने वाली मांसपेशियों और मारक आंखों के साथ निश्छल ह्रदय उस नायक की खूबी है जिसे सलमान पेश करते हैं। "एक था टाइगर" में भी इन्हीं विशेषताओं के कारण दर्शकों की तालियां उन्हें मिली थीं। दक्षिण में रजनीकांत की एक छवि है, बरसों से। खासियत यह है कि हिन्दी में गिनी-चुनी या केवल डब्ड फिल्मों के माध्यम से ही पहचाने जाने वाले रजनीकांत अपनी सामाजिक छवि के कारण देशव्यापी लोकप्रियता रखते हैं। सलमान खान इस समय सफलता और दर्शकों की दीवानगी को खूब एन्जॉय कर रहे हैं और जितना लगाव दर्शकों को उनसे है, उतना ही लगाव वे खुद भी दर्शकों से प्रकट करते हैं। उनके घर के सामने सड़क पर खड़ा प्रशंसक सलमान की छवि हमेशा उस वक्त सहजता से पा लेता है, जब सलमान घर में होते हैं। अपनी मां के हुक्म पर वे कई बार छज्जे और बाहर जाकर प्रशंसकों का दिल लूट आते हैं।
सलमान जाहिर है, नम्बर वन और सफलता की बिला-शक गारंटी वाले हीरो हैं। अपनी फिल्मों में वे इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि मनोरंजन के नाम पर उनको चाहने वाला दर्शक निराश न हो। पटकथा में उनकी गहरी रुचि और खासकर संवादों में सुधरी-सुथरी हिन्दी, उनके अलावा दूसरे कलाकारों से बहुत ज्यादा बेहतर है। वे हिन्दी दर्शकों की अपेक्षाओं को खूब समझते हैं। उनसे हिन्दी में बात करना आसान है, समझदार सवाल पसंद करने वाले सलमान, समझदारी के जवाब देना भी खूब जानते हैं। हिन्दी सिनेमा का आज का नायक परिदृश्य देखें तो सलमान ही ऐसे कलाकार दिखाई देते हैं जो दर्शकों की मेहरबानियों का मतलब बड़ी संजीदगी से समझते हैं। उन्होंने अपने अनुभवों और दर्शकों के बीच अपनी व्यापक जगह से अपनी छबि का पैमाना तय किया है।
दबंग के दूसरे भाग के एक प्रोमो का अंतिम सीन याद आता है, जिसमें वे एक बुरे आदमी को बुरी तरह पटक-पीटकर पलटकर मुड़ते हैं, यह कहते हैं, "मां की झूठी कसम नहीं खाते..... यहीं एक भदेस भी है जो उच्चारित नहीं होता लेकिन परदे पर दर्शक उसी पर अपना खुला आल्हाद व्यक्त करेंगे। सीधी के बजाय उल्टी गिनती के रोमांच से आनंदित होने वाले दर्शकों के बीच हिन्दी सिनेमा के आज में सलमान खान मजबूत नींव के महानायक हैं, ऐसा बिना कॉपी जांचे पूरे नंबर देने वाले दर्शक यों ही नहीं कहते।