रविवार, अक्तूबर 21, 2012

थम गया रोमांस का ''यश''

कम लोगों को मालूम होगा कि यश चोपड़ा का बंबई (अब मुंबई) आना इसलिए हुआ था कि वे इंजीनियर बनेंगे। वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लंदन जाने वाले थे, पासपोर्ट भी बन गया था, लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। उन्हें बनना था रिश्तों का इंजीनियर, सो वे आ गए सिनेमाई संसार में और बन गए निर्देशक। उन्होंने एक इंजीनियर की तरह ही रिश्तों को बारीकी से देखना शुरू किया और गूंथ डाली रिश्तों में डूबी प्यार की कई कहानियां। ऐसी कहानियां, जो एक के बाद एक फिल्मों के रूप में लोगों के सामने आती रहीं और लोग उन्हें देखने के लिए भागते रहे। उनकी धूल का फूल,वक्त, दाग, दीवार, त्रिशूल, सिलसिला सभी रिश्तों की चाशनी में डूबी कहानियां थीं। इन फिल्मों को भला कोई कभी भुला सकता है? कभी नहीं..।
अस्सी की उम्र में एक बार फिर यश चोपड़ा निर्देशन की दुनिया में सक्रिय हुए अपनी नई फिल्म जब तक है जान को लेकर। वीर-जारा के बाद उनके द्वारा निर्देशित यह फिल्म भी रिश्तों में डूबे प्यार की कहानी है। जब तक है जान के बारे में चर्चा है कि यह यश जी की फिल्म दाग जिसके जरिए उन्होंने 1973 में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा था और अपना बैनर यशराज फिल्म्स बनाया था, का नया रूप होगा। दाग राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी अभिनीत फिल्म थी और जब तक है जान शाहरुख खान, कट्रीना कैफ और अनुष्का शर्मा अभिनीत फिल्म है।
27 सितंबर, 1932 को लाहौर में जन्मे यशराज चोपड़ा के भाई बी.आर.चोपड़ा फिल्म निर्माण में जुटे थे। आगे की पढ़ाई के लिए यश लंदन जाने वाले थे, लेकिन बंबई आने के बाद जब यश चोपड़ा ने फिल्म निर्माण की प्रक्रिया देखी, तो उनके मन में भी फिल्मों से जुड़ने की तमन्ना जगी। एक दिन यश जी ने बी.आर.चोपड़ा के सामने अपने दिल की बात रखी। उन्होंने पहले तो समझाया, लेकिन जब उन्हें यह लगा कि भाई अपने इरादे से पीछे हटने वाला नहीं है, तो उन्होंने सहमति दे दी। बी.आर.चोपड़ा ने यश जी को काम सीखने के लिए एक-दूसरे निर्देशक के पास भेज दिया। वे तीन दिन वहां गए।
फिर उन्होंने महसूस किया कि वे सही जगह नहीं आए हैं, क्योंकि निर्देशक जिस तरह की फिल्में बना रहे थे, उनमें यश जी की कोई रुचि नहीं थी। वे सिर्फ भाई साहब के साथ काम करना चाहते थे, पर उनके लिए मुश्किल यह था कि वे अपनी बात उन तक कैसे पहुंचाएं! एक दिन ये बात वहा पहुंच गई, तो भाई ने भी उनकी बात मान ली और अपना सेकेंड असिस्टेंट बना लिया। वे तीन फिल्मों एक ही रास्ता,साधना और नया दौर के सहायक निर्देशक बने। काम के प्रति यश जी के समर्पण को देखते हुए बी.आर.चोपड़ा ने तब बहुत बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने एक फिल्म धूल का फूल बनाने का फैसला किया। इसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने तत्कालीन मुख्य सहायक निर्देशक ओमी बेदी और यश जी को सौंप दी। यह उनके लिए बहुत अच्छी बात थी, तभी ओमी को स्वतंत्र रूप से एक फिल्म के निर्देशन का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। फिर तय हुआ कि फिल्म को यश जी ही निर्देशित करेंगे। यह एक नाजायज बच्चे की कहानी थी, जिसकी कामयाबी ने उन्हें चर्चा में ला दिया। बी.आर.फिल्म्स की अगली फिल्म थी धरम पुत्र और उसके निर्देशन का भार भी यश जी को सौंपा गया। यह फिल्म हिन्दू-मुसलिम एकता पर आधारित थी, जिसे नेशनल अवार्ड मिला, लेकिन यह सफल नहीं हुई। फिर उन्हें वक्त के निर्देशन की जिम्मेदारी मिली। इस फिल्म की सफलता के बाद फिर उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी। उसके बाद यशराज फिल्म्स की स्थापना हुई और स्वतंत्र निर्माता के तौर पर दाग के रूप में उनकी पहली फिल्म सामने आई, जो बेहद सफल हुई। पचास से अधिक वर्षों का फिल्मी सफर तय करने वाले यश चोपड़ा द्वारा निर्मित-निर्देशित तमाम फिल्में हैं, जिन्हें जोरदार सफलता मिली। उनकी अन्य सफल फिल्मों की बात करें, तो इत्तेफाक, दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर, सिलसिला, चादंनी,डर,दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, मोहब्बतें, धूम, वीर-जारा, बंटी और बबली, फना, धूम 2, चक दे इंडिया, रब ने बना दी जोड़ी आदि उल्लेखनीय हैं। फिल्म निर्माण और निर्देशन के लिए यश जी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला। इससे अलग वे तमाम फिल्मों के नेशनल और फिल्मफेयर अवार्ड भी खाते में जमा हैं। आज यशजी भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग में उनकी यादों सूरज हमेशा चमकता रहेगा।