शनिवार, दिसंबर 15, 2012

हमारे नायक का चेहरा-छवि

दबंग के दूसरे भाग के प्रोमो चैनलों पर दिखाई देने लगे हैं। सर्वमान्य नायक सलमान खान पहले भाग की दबंग के अपने किरदार "चुलबुल पांडे" को अपने निर्देशक भाई अरबाज खान और पटकथा लेखक के जरिए किस तरह से स्थापित करते हैं, इसकी जिज्ञासा दर्शकों में ज्यादा है। "दबंग 2" में सलमान के विरुद्ध "वॉन्टेड" वाले खलनायक प्रकाश राज हैं जिनको हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने उसी फिल्म के "गनी भाई" वाले किरदार में खूब पहचाना था। इधर हिन्दी सिनेमा में सच्चे खलनायक वीरों से भूमि खाली पड़ी है और प्रकाश राज आसानी से उस जमीन में अपना खम्ब गाड़ने में सफल हो रहे हैं। प्रकाश राज एक सॉफ्ट-फेस-स्पोकन प्रभाव वाले विलेन हैं जो अनिल शर्मा की नई फिल्म "सिंह साहेब द ग्रेट" में भी अच्छे रोल के लिए अनुबंधित हैं। सलमान खान हमारे सिनेमा में एक ऐसे नायक को पेश कर रहे हैं जिसका आदर्शवाद उसके द्वारा खुद निजी रूप से गढ़ा हुआ है जिसमें वह बुरे लोगों से अपने ढंग से निबटता है। वह आत्मविश्वास और क्षमताओं के साथ-साथ बहादुरी से भरा हुआ है। वह रोमांटिक है और प्यार करने और जताने का उसका अपना ढंग है। यहां भी उसका अपना शिष्टाचार गजब का है। सलमान और सोनाक्षी की यह केमेस्ट्री दबंग भाग दो में भी बड़े दिलचस्प ढंग से नजर आती है। सलमान का नायक अपनी नायिका चुनता है, बेवजह फ्लर्ट नहीं करता जिसकी कद्र स्त्रियों में कुछ ज्यादा ही है। चौड़े सीने, प्रभावित करने वाली मांसपेशियों और मारक आंखों के साथ निश्छल ह्रदय उस नायक की खूबी है जिसे सलमान पेश करते हैं। "एक था टाइगर" में भी इन्हीं विशेषताओं के कारण दर्शकों की तालियां उन्हें मिली थीं। दक्षिण में रजनीकांत की एक छवि है, बरसों से। खासियत यह है कि हिन्दी में गिनी-चुनी या केवल डब्ड फिल्मों के माध्यम से ही पहचाने जाने वाले रजनीकांत अपनी सामाजिक छवि के कारण देशव्यापी लोकप्रियता रखते हैं। सलमान खान इस समय सफलता और दर्शकों की दीवानगी को खूब एन्जॉय कर रहे हैं और जितना लगाव दर्शकों को उनसे है, उतना ही लगाव वे खुद भी दर्शकों से प्रकट करते हैं। उनके घर के सामने सड़क पर खड़ा प्रशंसक सलमान की छवि हमेशा उस वक्त सहजता से पा लेता है, जब सलमान घर में होते हैं। अपनी मां के हुक्म पर वे कई बार छज्जे और बाहर जाकर प्रशंसकों का दिल लूट आते हैं।
सलमान जाहिर है, नम्बर वन और सफलता की बिला-शक गारंटी वाले हीरो हैं। अपनी फिल्मों में वे इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि मनोरंजन के नाम पर उनको चाहने वाला दर्शक निराश न हो। पटकथा में उनकी गहरी रुचि और खासकर संवादों में सुधरी-सुथरी हिन्दी, उनके अलावा दूसरे कलाकारों से बहुत ज्यादा बेहतर है। वे हिन्दी दर्शकों की अपेक्षाओं को खूब समझते हैं। उनसे हिन्दी में बात करना आसान है, समझदार सवाल पसंद करने वाले सलमान, समझदारी के जवाब देना भी खूब जानते हैं। हिन्दी सिनेमा का आज का नायक परिदृश्य देखें तो सलमान ही ऐसे कलाकार दिखाई देते हैं जो दर्शकों की मेहरबानियों का मतलब बड़ी संजीदगी से समझते हैं। उन्होंने अपने अनुभवों और दर्शकों के बीच अपनी व्यापक जगह से अपनी छबि का पैमाना तय किया है।
दबंग के दूसरे भाग के एक प्रोमो का अंतिम सीन याद आता है, जिसमें वे एक बुरे आदमी को बुरी तरह पटक-पीटकर पलटकर मुड़ते हैं, यह कहते हैं, "मां की झूठी कसम नहीं खाते..... यहीं एक भदेस भी है जो उच्चारित नहीं होता लेकिन परदे पर दर्शक उसी पर अपना खुला आल्हाद व्यक्त करेंगे। सीधी के बजाय उल्टी गिनती के रोमांच से आनंदित होने वाले दर्शकों के बीच हिन्दी सिनेमा के आज में सलमान खान मजबूत नींव के महानायक हैं, ऐसा बिना कॉपी जांचे पूरे नंबर देने वाले दर्शक यों ही नहीं कहते।

मंगलवार, नवंबर 27, 2012

बॉक्स आफिस के बहाने

दोस्तो, लंबे अरसे बाद फिर इस शुक्रवार से आपको इस ब्लाग पर फिल्म समीक्षा परोसी जाएगी, यह लिखने के लिए मुझसे कहा गया है, चलिए काम के बहाने ही सही, हर शुक्रवार को बॉक्स आफिस की भीड़ का हिस्सा बनने का मौका तो मिलेगा, अगर वहां भीड़ नहीं भी हुई तो भी मुझे जाना पड़ेगा, भीड़ न जुटने की वजह जानने के लिए। तो आप सबसे गुजारिश है कि इस शुक्रवार यानि तीस नवंबर को रिलीज होने वाली आमिर खान की फिल्म तलाश पर लिखी जाने वाली समीक्षा पर अपनी राय जरूर दें।
सादर

रविवार, नवंबर 25, 2012

then in the world there are so many taj today...

Taj is the uncrowned king of the beauty in the world .. It was written in the fate of Mumtaz by Allah. Shahjahan had just spent the money, but the craftsmen, who made invaluable labor and the mind ..Think that make up the crown or their descendants are alive today ...and hereditary job to work as the Taj Mahal, then in the world there are so many taj today...

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

जमीं से उठकर सितारे बने शाहरुख


shahrukh khan
Shahrukh khan
इंसानी जीवन बड़ा ही रोचक होता है जहां किस्मत का सिक्का कब, कैसे चल जाए कहा नहीं जा सकता. यहां मेहनत और किस्मत अगर साथ हों तो रंक भी राजा बन जाता है और कई बार लोग जमीन से उठकर आसमान पर राज करने लगते हैं. अगर इस बात का बॉलिवुड की दुनिया में कोई प्रत्यक्ष उदाहरण है तो वह हैं आज बॉलिवुड के किंग खान के नाम से मशहूर शाहरुख खान जिनका आज जन्मदिन भी है.

शाहरुख खान का बचपन
शाहरुख खान का जन्म दिल्ली में हुआ. दिल्ली में ही पले बढ़े और अभिनय का ककहरा सीखने वाले शाहरुख बचपन से ही अभिनय के शौकीन थे. 02 नवंबर, 1965 को दिल्ली में जन्में शाहरुख के पिता तेज मोहम्मद खान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक सिपाही थे. उनकी मां लतीफ फातीमा थीं. वह पेशावर के रहने वाले पठान परिवार से संबंध रखते थे. माना जाता है शाहरुख के पूर्वज अफगानिस्तान से भारत आए थे. आजादी के बाद बंटवारे में शाहरुख खान के पिता दिल्ली आ गए. शाहरुख की बड़ी बहन का नाम शहनाज है.

दिल्ली के राजेन्द्र नगर के करीब पले बढ़े शाहरुख खान ने सेंट कोलम्बस स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की. स्कूल के दौरान ही उन्होंने अभिनय में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था. वह अपने स्कूल के होनहार छात्रों में से एक थे. स्कूल के बाद उन्होंने दिल्ली के हंसराज कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से मास कॉम्यूनिकेशन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की.

शाहरुख खान और टीवी के साथ उनका रिश्ता
पिता की मौत के बाद साल 1991 में उन्होंने दिल्ली छोड़ मुंबई बसने का फैसला किया और फिल्म जगत में हाथ आजमाना शुरू किया. लेकिन इससे पहले ही वह टीवी पर एक बेहतरीन कलाकार के रूप में अपनी जगह बना चुके थे. 1988 के सीरियल “फौजी” के द्वारा उन्होंने छोटे पर्दे से अपनी बादशाहत बनानी शुरू की. इसके बाद अजीज मिर्ज़ा के टीवी शो “सर्कस” में भी उन्होंने बेहतरीन काम किया. इन दो टीवी शो ने शाहरुख को छोटे पर्दे का एक नामी कलाकार बना दिया. लोग उनकी तुलना दिलीप कुमार तक से करने लगे. यह वह समय था जब शाहरुख की कामयाबी का असर शुरू हुआ था और शाहरुख के अभिनय में उस समय जो मेहनत दिखती थी उसे लोग अपनी निजी जिंदगी से जोड़ कर देखते थे. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आगे चलकर यह लड़का बॉलिवुड का बादशाह कहलाएगा.

shahrukh and gauriशाहरुख खान और गौरी खान
1991 में मुंबई जाने के बाद उन्होंने गौरी छिब्बर नाम की लड़की से शादी कर ली. उस समय उनकी एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई थी. आज भी बॉलिवुड में जब भी सर्वश्रेष्ठ दंपतियों का नाम आता है तो शाहरुख खान और गौरी खान का नाम जरूर लिया जाता है. अलग अलग धर्म के होने के बाद भी दोनों का साथ सुखद है. खुद शाहरुख भी मानते हैं कि उनकी सफलता में एक बहुत बड़ा हिस्सा गौरी खान का भी है. आज शाहरुख और गौरी खान के दो बच्चे आर्यन और सुहाना हैं. जहां अधिकतर फिल्मी सितारे अपनी पर्सनल लाइफ छुपाकर रखते हैं वहीं शाहरुख खान ने कभी अपने परिवार को कैमरे के पीछे नहीं बल्कि आगे रखा है.

शाहरुख खान का फिल्मी कॅरियर
बड़े पर्दे पर शाहरुख खान की पहली फिल्म “दीवाना” साल 1992 में आई जो एक हिट फिल्म साबित हुई. पहली ही फिल्म की सफलता ने शाहरुख को रातों रात कामयाबी की शिखर की तरफ धकेलना शुरू कर दिया. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर से भी सम्मानित किया गया. उन्हें सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार की श्रेणी में पुरस्कृत किया गया. इसके बाद आई फिल्म “माया मेमसाहब” भी बेहद चर्चा में रही पर सफलता की वजह से नहीं बल्कि गर्मागर्म सीन की वजह से.

शाहरुख खान और यशराज का कनेक्शन
साल 1993 से शाहरुख खान और यशराज फिल्म्स का ऐसा नाता जुड़ा कि किंग खान और यशराज फिल्म्स की दुनिया ही बदल गई. दोनों ने मिलकर हिन्दी सिनेमा जगत को जैसे बदल दिया. दर्शकों को “राज” नाम का एक ऐसा किरदार मिला जिसमें वह खुद को महसूस करने लगे. इस सफर की शुरूआत हुई साल 1993 की फिल्म “डर” और “बाजीगर” से. इन दोनों फिल्मों में शाहरुख खान ने अभिनेता और विलेन के बीच की दूरियां मिटा दी. जहां “डर” में उन्होंने एक पागल प्रेमी का किरदार निभाया तो वहीं “बाजीगर” में उन्होंने बदले की भावना से जलते हुए एक युवा को पर्दे पर पेश किया. दोनों ही फिल्मों में उनका अभिनय बेजोड़ था. बाजीगर के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अवार्ड से नवाजा गया. साल 1993 में ही उनकी एक और सफल फिल्म “कभी हां कभी ना” आई जिसमें उन्होंने संगीतकार की भूमिका निभाई थी. अगले ही साल फिल्म “अंजाम” में फिर शाहरुख ने एक निगेटिव किरदार को पर्दे पर इस तरह से निभाया कि उन्हें पहली बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ विलेन का अवार्ड दिया गया.

dilwale dulhaniya le jaengeदिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे
साल 1995 शाहरुख और भारतीय सिनेमा के लिए बेहद महत्वपूर्ण वर्ष रहा. इस साल ने जैसे हिन्दी सिनेमा को बदल कर रख दिया. इस साल पहले आई सुपरहिट फिल्म “करण अर्जुन” जिसमें सलमान और शाहरुख ने पहली बार एक साथ काम किया. और इसके बाद आई आदित्य चोपड़ा की “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे”. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड धवस्त कर दिए. इस फिल्म में शाहरुख खान ने राज नाम के एक एनआरआई का किरदार निभाया था. इस फिल्म को आज भी बॉलिवुड की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक माना जाता है. यह शाहरुख और काजोल की जोड़ी का ही कमाल था कि आज भी जब कभी दोनों परदे पर एक साथ किसी फिल्म में नजर आते हैं तो दर्शक उसी राज और सिमरन को ढूंढ़ते हैं जो उन्होंने “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” में देखे थे.

शाहरुख खान का सफर
साल 1996 तो शाहरुख खान के लिए खास नहीं रहा पर साल 1997 में सुभाष घई की फिल्म “परदेस” में एक बार फिर साबित हो गया कि रोमांटिक किरदार में शाहरुख से अच्छा कोई नहीं ढल सकता. इसी साल कॉमेडी फिल्म “यश बॉस” ने भी बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की थी. लेकिन साल 1997 की सबसे सफल फिल्म रही “दिल तो पागल है”. इस फिल्म के लिए उन्हें तीसरी बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अवार्ड से सम्मानित किया गया.

साल 1998 में करण जौहर के निर्देशन में बनी पहली फिल्म “कुछ कुछ होता है” ने एक बार फिर काजोल और शाहरुख की केमिस्ट्री को पर्दे पर ला खड़ा किया. यह फिल्म आज भी कई युवाओं की पसंदीदा फिल्म है. इस फिल्म के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा गया. हालांकि इसके बाद फिल्म “दिल से” और “बादशाह” औसत दर्जे की फिल्म ही साबित हुई.

लेकिन साल 2000 में आई “मोहब्बतें” ने एक बार फिर किंग खान को बॉलिवुड के शीर्ष पर ला खड़ा किया. इस फिल्म में पहली बार शाहरुख अमिताभ बच्चन के साथ पर्दे पर नजर आए. दोनों कलाकारों ने ऐसा अभिनय किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए. हालांकि इसके बाद शाहरूख खान की कोई खास बड़ी फिल्म नहीं आई पर “जोश” और “फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” जैसी फिल्मों ने शाहरुख की लोकप्रियता को बढ़ाने का ही काम किया.

साल 2001 में एक बार फिर शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन एक साथ बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. फिल्म “कभी खुशी कभी गम” के साथ दोनों ने फिल्मी पर्दे पर बेहतरीन पारिवारिक मनोरंजन को पेश किया. हालांकि उनकी अगली फिल्म “अशोका” कुछ खास नहीं कर पाई.

साल 2002 में शाहरुख खान की दो बड़ी फिल्में आईं. “देवदास” में शाहरुख के अभिनय को उनके अब तक के सबसे बेहतरीन रोलों में गिना जाता है तो वहीं साल की दूसरी फिल्म “हम तुम्हारे हैं सनम” में भी शाहरुख का काम बेहतरीन था.

shahrukh in chak deबेमिसाल शाहरुख खान
इसके बाद अगर फिल्म “पहेली” को छोड़ दिया जाए तो शाहरुख ने हर मोर्चे पर सफलता की कहानी लिखी. “मैं हूं ना”, “वीर-जारा”, “स्वदेश”, “कभी अलविदा ना कहना”, “चक दे इंडिया”, “डॉन: द चेस बिगेन”, “रब ने बना दी जोड़ी” जैसी फिल्मों ने शाहरुख के कद को अमिताभ के बराबर ला खड़ा किया. हाल के सालों में शाहरुख की सबसे ज्यादा सफल फिल्मों में “चक दे इंडिया”, “माई नेम इज खान” और हाल ही में रिलीज हुई “रा-वन” शामिल हैं.

शाहरुख खान अभिनय के साथ फिल्मों में निर्माता का भी रोल निभा चुके हैं. उन्होंने अपनी मित्र जूही चावला के साथ मिलकर प्रोडक्शन कंपनी “ड्रीम्स अनलिमिटेड” शुरू की थी जिसके तहत उन्होंने “फिर भी दिल है हिंदुस्तानी”, “अशोका” और “चलते चलते” जैसी बेहतरीन फिल्में बनाई और इन फिल्मों में काम भी किया.

साल 2004 में शाहरुख खान ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोली और नाम दिया “रेड चिलीज एंटरटेनमेंट”. इस बैनर के तले उन्होंने “मैं हूं ना”, “ओम शांति ओम”, “चक दे इंडिया”, “बिल्लू बारबर” और “रा वन” जैसी फिल्में बनाई हैं.

शाहरुख खान ने कभी टेलीविजन से ही अपने कॅरियर की शुरूआत की थी और सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी वह इसके जादू से अछूते नहीं रहे. उन्होंने कौन बनेगा करोडपति के तीसरे संस्करण और टीवी शो “क्या आप पांचवी पास से तेज हैं?” जैसे शो होस्ट किए हैं. साल 2011 में उन्होंने कलर्स चैनल पर शो “जोर का झटका” भी होस्ट किया था.

फिल्मों से इतर भी शाहरुख की एक दुनिया है जहां के वह बादशाह हैं और वह है उनका बंगला “मन्नत” और उनके प्रशंसकों का दिल. सलमान का जादू अगर हर भारतीय पर चलता है तो शायद शाहरुख विदेश में बसे भारतीयों और विदेशों में हिन्दी फिल्में देखने वाले दर्शकों की पहली पसंद हैं.

शाहरुख खान को मिले पुरस्कार
  • शाहरुख खान को छह बार फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अवार्ड से नवाजा गया है. उन्हें फिल्म बाजीगर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है, देवदास और स्वदेश के लिए यह पुरस्कार दिया गया.
  • शाहरुख खान को साल 1995 में फिल्म “अंजाम” के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ विलेन का अवार्ड भी दिया गया था.
  • उनकी फिल्म “दीवाना” के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार का अवार्ड दिया गया.
  • फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड फॉर बेस्ट एक्टर के खिताब से भी उन्हें दो बार नवाजा गया है. फिल्म “मोहब्बतें” और “कभी हां कभी ना” के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिए गए.
  • 2005 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.
शाहरुख खान को फिल्मी दुनिया में सफल इंसान के साथ कई बार एक घमंडी इंसान के रूप में भी देखा जाता रहा है जो कई मायनों में गलत है. शाहरुख खान और आमिर खान की दुश्मनी तो जगजाहिर है साथ ही कई बार मीडिया में शाहरुख खान और सलमान के बीच खटास की खबरें भी आती रही हैं जो आजकल बढ़ गई हैं. कुछ समय पहले उनके और अमिताभ के रिश्तों को लेकर भी विवाद था पर अब वह सुलझ चुका है.

शाहरुख खान का जीवन कई मायनों में प्रेरणास्पद है कि आखिर किस तरह दिल्ली का एक आम लड़का अपनी मेहनत और लगन के बल पर कामयाबी के शिखर तक पहुंच गया.

सोमवार, अक्तूबर 22, 2012

लोगों को ‘संविधान’ सिखाएंगे श्याम बेनेगल

श्याम बेनेगल....एक कालजयी और सौम्यता में लिपटा एक विनम्र, बेहतरीन इंसान। सही मायनों में बेनेगल एक फिल्मकार नहीं दृष्टा हैं। फरवरी 2006 में मनोनीत सदस्य के तौर पर राज्यसभा की शपथ लेने के बाद, ज्यादातर सांसदों से उलट, बेनेगल उसे हूबहू निभाने में लग गए। संसद में अपनी मौजूदगी को लेकर किसी खांटी पार्लियामेंटेरियन से भी ज्यादा संजीदा.. हमेशा हाज़िर। हालांकि मैंने उन्हें सदन में सवाल पूछते या मुद्दा उठाते ज्यादा नहीं देखा..लेकिन फिर भी संसद की कार्यवाही के वक्त वो भीतर ही होते। शायद सांसदों की हर छोटी-बड़ी हरकत को किसी अदृश्य कैमरे में कैद करने के लिए। कोई 'निजी' सियासी दिलचस्पी ना होने के बावजूद संसद ठप होने पर उनके चेहरे पर वही अफसोस होता जो किसी अहम शूटिंग के वक्त आई बारिश के चलते 'पैकअप' कहने में भी नहीं होता होगा- 'एक और कीमती दिन बरबाद हो गया।' बेनेगल इस बार भारतीय संविधान पर एक कार्यक्रम लेकर छोटे पर्दे पर आ रहे हैं। यह जानकारी मेरी उनसे फोन पर हुयी बातचीत में मिल़ी...
1970 में शुरू हुए प्रयोगात्मक फिल्म आंदोलन के शुरूआती नारेबाज हैं श्याम बेनेगल। कला फिल्में कहलाने वाली उनकी फिल्में दरअसल कलात्मक फिल्में हैं जो आपके कंधे झंझोड़ कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाने में यकीन नहीं रखती। बल्कि एक अनुभवी उपदेशक की तरह अपना संदेश आपकी रगों तक पहुंचाती हैं, ताकि वो देर तक आपके जहन में पिघलता रहे। वैसे 'वेलकम टु सज्जनपुर' और 'वेल डन अब्बा' की शक्ल में बेनेगल ने हल्की-फुल्की फिल्में भी बनाईं, जिनके निर्माताओं ने बॉक्स आॅफिस पर मोटा माल भी बटोरा। बातचीत में बेनेगल ने बताया कि आगामी दिसंबर में वे भारतीय संविधान पर एक टेलीफिल्म लेकर आ रहे हैं, इसमें राजनीतिक ड्रामा है। दस एपिसोड यानि दस घंटे का यह पॉलिटिकल ड्रामा लोगों को संविधान के बारे में बताएगा। उनका मनोरंजन करने के साथ-साथ शिक्षित भी करेगा। बेनेगल कहते हैं,’हम लोगों को अपने कांस्टीट्यूशन को समझना चाहिए। वह क्या है, उसे जानना चाहिए। हमने इस टेलीफिल्म पर काफी मेहनत की है। दिसंबर तक यह तैयार हो जाएगा। अंबेडकर ने 1952 के चुनाव में अपनी पार्टी के घोषणापत्र में कृषि को प्राथमिकता दी थी। वह कृषि को औद्योगिक रूप देना चाहते थे ताकि समाज के निचले तबके का शोषण न हो और देश में समृद्धि भी आये।’
बेफिक्र, बेदर्द और बेअंदाज फिल्मी दुनिया में बेहद अनुशासित 40 साल बिता चुके श्याम बेनेगल को संसद में तथाकथित 'माननीयों' का वो बेढंग रवैया कैसे रास आता। उनके लिए तो संसद जाना जैसे एक कोर्स है, जिसके हर लम्हे का वो तसल्लीबख़्श इस्तेमाल चाहते हों। हमारे बेतकल्लुफ और बचकाने सवालों पर उन्होंने कभी नजरें नहीं तरेरीं। बेनेगल ने स्लमडाग मिलिनेयर के बारे में पहले ही घोषणा कर दी थी कि ये फिल्म '7 से 8 अवार्ड जीतेगी।' और जब टीवी पर खबर आयी -'आॅस्कर में स्लमडॉग मिलिनेयर की धूम, 8 अवार्ड जीते।' ये वो तजुर्बा है जिसके लिए दाढ़ी के सफेद बाल ही काफी नहीं होते.. उसके लिए श्याम बेनेगल बनना पड़ता है।
बेनेगल की तकरीबन हर फिल्म में काम कर चुके अमरीश पुरी ने अपनी आत्मकथा 'एक्ट आॅफ लाइफ' में लिखा है- 'श्याम एक चलता फिरता विश्वकोश हैं। वो इस धरती पर किसी भी विषय पर चर्चा कर सकते हैं। उनसे दुनिया के किसी भी हिस्से में सबसे बढ़िया और चुनिंदा रेस्टोरेंट के बारे में पूछ लो और वो आपके सामने फौरन एक फेहरिस्त रख देंगे, जहां उन्होंने खाना खाया हो.. हर विषय पर जानकारी रखना एक अद्भुत गुण है और श्याम ने हर बार इसे साबित किया है।' अमरीश पुरी साहब के दावे की निजी पड़ताल का दुस्साहस मैंने कभी नहीं किया, क्योंकि श्याम बेनेगल से बात करने भर से ही तबियत तृप्त हो जाती है। वैसे भी उनके साथ बने भुरभुरे रिश्ते को मैं अपने पेशेवर लालच से दूर रखना चाहता था लिहाजा 'कम पूछना- ज्यादा सुनना' का फलसफा ही निभाता रहा। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बेनेगल को मिली तारीफों और पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है जितना किसी हिंदी फिल्म का क्रेडिट रोल भी नहीं होता। भारतीय सिनेमा का आॅस्कर यानी दादासाहेब फाल्के अवार्ड.. सात बार सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार.. पद्मश्री.. पद्म भूषण। बर्लिन, मॉस्को, कान्स जैसे प्रतिष्ठित सिनेमा समारोहों में उनकी फिल्मों का आना-जाना जैसे होता है, वैसे आपका और हमारा सिनेमा घरों में भी नहीं होता। 1000 से ज्यादा एडवरटाइजमेंट बना चुके श्याम बेनेगल ने सिनेमा को गुदड़ी के वो लाल दिए जिनके लिए ना सिर्फ हिंदुस्तानी बल्कि विश्व सिनेमा भी उनका कर्ज़दार रहेगा। नसीरुद्दीन शाह.. ओम पुरी.. अमरीश पुरी.. अनंत नाग.. शबाना आजमी.. स्मिता पाटिल.. और.. उनके पसंदीदा सिनेमेटोग्राफर गोविंद निहलानी। फ्रांसीसी फिल्मकार ज्यां ल्युक गोदार ने कहा था- 'सिनेमा जिंदगी को फिल्माने की कला नहीं है.. वो तो जिÞंदगी और कला के बीच का 'कुछ' है।' और.. श्याम बेनेगल ने तो अंकुर.. निशांत.. मंथन.. भूमिका.. जुनून.. आरोहन.. त्रिकाल.. सूरज का सातवां घोड़ा.. द मेकिंग आॅफ महात्मा.. सरदारी बेगम और जुबैदा इत्यादी की शक्ल में 'इतना कुछ' दिया है जिसे देख-देख कर आज भी सिनेमा के छात्र आॅस्कर जीतने का ख्वाब पुचकारते हैं। और... इतिहास के 'ऐतिहासिक' कायापलट की नायाब मिसाल- 'भारत एक खोज'.. उसे भला कोई कैसे भूल सकता है। अंत में फोन काटते-काटते मैंने पूछा..‘सर और अगली फिल्म कब तक? बोले-क्रिप्ट पर काम तो चल रहा है, लेकिन अभी वक्त तो इसी में चला जाएगा। बेनेगल साहब महान फिल्मकार गुरुदत्त के रिश्तेदार हैं। वे विद्या बालन के साथ एक स्पेनिश कहानी पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। वो फिल्म जब भी बने, पर मुझे पक्का यकीन है कि पहले वो सियासतदानों की बखियां उधेड़ती अपनी एक नई फिल्म के साथ हाज़िर होंगे, जिसमें देश की उस सबसे बड़ी पंचायत के कई मुकदमों का कच्चा चिट्ठा होगा, जिसकी 'खोज' में उन्होंने 6 साल बिताए।

रविवार, अक्तूबर 21, 2012

थम गया रोमांस का ''यश''

कम लोगों को मालूम होगा कि यश चोपड़ा का बंबई (अब मुंबई) आना इसलिए हुआ था कि वे इंजीनियर बनेंगे। वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लंदन जाने वाले थे, पासपोर्ट भी बन गया था, लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। उन्हें बनना था रिश्तों का इंजीनियर, सो वे आ गए सिनेमाई संसार में और बन गए निर्देशक। उन्होंने एक इंजीनियर की तरह ही रिश्तों को बारीकी से देखना शुरू किया और गूंथ डाली रिश्तों में डूबी प्यार की कई कहानियां। ऐसी कहानियां, जो एक के बाद एक फिल्मों के रूप में लोगों के सामने आती रहीं और लोग उन्हें देखने के लिए भागते रहे। उनकी धूल का फूल,वक्त, दाग, दीवार, त्रिशूल, सिलसिला सभी रिश्तों की चाशनी में डूबी कहानियां थीं। इन फिल्मों को भला कोई कभी भुला सकता है? कभी नहीं..।
अस्सी की उम्र में एक बार फिर यश चोपड़ा निर्देशन की दुनिया में सक्रिय हुए अपनी नई फिल्म जब तक है जान को लेकर। वीर-जारा के बाद उनके द्वारा निर्देशित यह फिल्म भी रिश्तों में डूबे प्यार की कहानी है। जब तक है जान के बारे में चर्चा है कि यह यश जी की फिल्म दाग जिसके जरिए उन्होंने 1973 में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा था और अपना बैनर यशराज फिल्म्स बनाया था, का नया रूप होगा। दाग राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी अभिनीत फिल्म थी और जब तक है जान शाहरुख खान, कट्रीना कैफ और अनुष्का शर्मा अभिनीत फिल्म है।
27 सितंबर, 1932 को लाहौर में जन्मे यशराज चोपड़ा के भाई बी.आर.चोपड़ा फिल्म निर्माण में जुटे थे। आगे की पढ़ाई के लिए यश लंदन जाने वाले थे, लेकिन बंबई आने के बाद जब यश चोपड़ा ने फिल्म निर्माण की प्रक्रिया देखी, तो उनके मन में भी फिल्मों से जुड़ने की तमन्ना जगी। एक दिन यश जी ने बी.आर.चोपड़ा के सामने अपने दिल की बात रखी। उन्होंने पहले तो समझाया, लेकिन जब उन्हें यह लगा कि भाई अपने इरादे से पीछे हटने वाला नहीं है, तो उन्होंने सहमति दे दी। बी.आर.चोपड़ा ने यश जी को काम सीखने के लिए एक-दूसरे निर्देशक के पास भेज दिया। वे तीन दिन वहां गए।
फिर उन्होंने महसूस किया कि वे सही जगह नहीं आए हैं, क्योंकि निर्देशक जिस तरह की फिल्में बना रहे थे, उनमें यश जी की कोई रुचि नहीं थी। वे सिर्फ भाई साहब के साथ काम करना चाहते थे, पर उनके लिए मुश्किल यह था कि वे अपनी बात उन तक कैसे पहुंचाएं! एक दिन ये बात वहा पहुंच गई, तो भाई ने भी उनकी बात मान ली और अपना सेकेंड असिस्टेंट बना लिया। वे तीन फिल्मों एक ही रास्ता,साधना और नया दौर के सहायक निर्देशक बने। काम के प्रति यश जी के समर्पण को देखते हुए बी.आर.चोपड़ा ने तब बहुत बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने एक फिल्म धूल का फूल बनाने का फैसला किया। इसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने तत्कालीन मुख्य सहायक निर्देशक ओमी बेदी और यश जी को सौंप दी। यह उनके लिए बहुत अच्छी बात थी, तभी ओमी को स्वतंत्र रूप से एक फिल्म के निर्देशन का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। फिर तय हुआ कि फिल्म को यश जी ही निर्देशित करेंगे। यह एक नाजायज बच्चे की कहानी थी, जिसकी कामयाबी ने उन्हें चर्चा में ला दिया। बी.आर.फिल्म्स की अगली फिल्म थी धरम पुत्र और उसके निर्देशन का भार भी यश जी को सौंपा गया। यह फिल्म हिन्दू-मुसलिम एकता पर आधारित थी, जिसे नेशनल अवार्ड मिला, लेकिन यह सफल नहीं हुई। फिर उन्हें वक्त के निर्देशन की जिम्मेदारी मिली। इस फिल्म की सफलता के बाद फिर उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी। उसके बाद यशराज फिल्म्स की स्थापना हुई और स्वतंत्र निर्माता के तौर पर दाग के रूप में उनकी पहली फिल्म सामने आई, जो बेहद सफल हुई। पचास से अधिक वर्षों का फिल्मी सफर तय करने वाले यश चोपड़ा द्वारा निर्मित-निर्देशित तमाम फिल्में हैं, जिन्हें जोरदार सफलता मिली। उनकी अन्य सफल फिल्मों की बात करें, तो इत्तेफाक, दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर, सिलसिला, चादंनी,डर,दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, मोहब्बतें, धूम, वीर-जारा, बंटी और बबली, फना, धूम 2, चक दे इंडिया, रब ने बना दी जोड़ी आदि उल्लेखनीय हैं। फिल्म निर्माण और निर्देशन के लिए यश जी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला। इससे अलग वे तमाम फिल्मों के नेशनल और फिल्मफेयर अवार्ड भी खाते में जमा हैं। आज यशजी भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग में उनकी यादों सूरज हमेशा चमकता रहेगा।

मंगलवार, सितंबर 11, 2012

दी सैटरडे नाईट पर ढोबले ने गढ़ी नजर

किसी वजह से मैंने अपना मोबाईल सायलेंट मोड पर रख कर जेब में रख दिया था। अपने काम में अच्छा खासा व्यस्त रहा इसलिए फोन की याद ही नहीं आई। फिर जब काम खत्म होने के बाद अचानक मुझे फोन की याद आई तो मैंने जेब से फोन निकाला और देखा तो ढ़ेर सारे मिस कॉल आ पड़े थे। उनमें सबसे ज्यादा कॉल बॉलीवुड के मशहूर फिल्म प्रचारक राजू कारीया के थे। मुझे लगा कि राजू कोई बड़ी ब्रेकिंग देना चाहता है इसलिए वह फोन कर रहा है। मैंने तुरंत ही राजू को फोन लगाया तो उसने बताया कि, एसीपी विकास ढोबले के विरोध में पेज ३ पार्टी के लोगों ने ओशिवरा पुलिस स्टेशन पर भव्य मोर्चा निकाला है। मोर्चे में युवक-युवतियों के साथ बॉलीवुड और टेलीवुड के लोग भी हैं। अभिनेता अमन वर्मा माही खंडुरी, शीतल शाह, नासीर अब्दुल्ला, विपुल कपिल, मुश्ताक खान, स्मिता जयकर, गणेश जाधव,अश्विन कौशल और विश्वजीत प्रधान सबसे आगे दिख रहे हैं।


उसकी बात सुन कर मुझे ताज्जुब हुआ क्योंकि ओशिवरा पुलिस स्टेशन पर फिल्मी लोग ढोबले के खिलाफ मोर्चा लेकर क्यों जा रहे हैं, क्योंकि ढोबले का तो २ दिन पहले ही सांताक्रुज तबादला कर दिया गया था। मैंने राजू से पता लिया और जब मोर्चे वाले स्थान पर पहुंचा तो सन्न हो गया क्योंकि जिस जगह मैं पहुंचा वह स्थान ओशिवरा पुलिस स्टेशन नहीं बल्कि गोरेगाव पश्चिम का फिल्मीस्तान स्टु़डियो था। स्टुडियो में प्रवेश करते ही जो पुरानी इमारत नजर आती है उसे ही निर्माता-निर्देशक जयप्रकाश ने ओशिवरा पुलिस स्टेशन बनाया था। वहीं पर इन्स्पेक्टर ढोबले भी उपस्थित थे और मोर्चा लेकर आए लोगों से बात कर रहे थे।

आप पुलिस स्टेशन पर मोर्चा लेकर आए इसलिए धन्यवाद कहकर उन्होंने आगे कहा कि, आपके इस मोर्चे से मुझ पर या मेरी ड्युटी पर कोई असर होने वाला नहीं है। आपने आज के नए समाज में जो एक नई कुल नीति अपनाई है, उसे मैं हटा कर ही जाऊंगा। आज मुंबई के समुंदर किनारे पत्थरों के पीछे, गाड़ियों में खुले आम सेक्स किया जा रहा है। आप यह मोर्चा लेकर वहां जाईए और उन्हें रोके। यह मोर्चा इन पंचसितारा होटलों पर भी ले जाएं जहां के डिस्को थेक में आप ही के समाज की कुछ लड़कियां अर्धनग्न अवस्था में किसी लड़के के साथ प्रवेश करती है, किसी और लड़के के साथ ड्रिंक और शराब का मजा लेती है और सुबह किसीऔर लड़के के बे़डरूम से बाहर आती हैं। मैं यहां इन सारी कुरीतिय़ों को खत्म करने के लिए आया हूं और इसे बंद करके ही जाऊंगा। ढोबले बने आरिफ जकेरिया का कहना खत्म होते ही पुलिस वालों ने अमन वर्मा के साथ सभी को वहां से खदेड़ दिया।

यह दृश्य वाकई आज के युवाओं को अच्छी सीख देने वाला था। आज की युवा पिढ़ी उस संस्कृती में लौट रही हैं जहां मां-बाप, भाई-बहन में कोई रिश्ता नहीं। कुछ घटनांएं देख कर हमें लगता है कि आज की तारीख में एक नहीं बल्कि सैकड़ो, हजारों ढोबले की आवश्यकता है जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की आज की पिढ़ी को सुधारने की हिम्मत रखे। यह फिल्म भी आज के युवाओं को सबक सिखाते हुए संदेश देने वाली है। फिल्म का नाम है दी सैटरडे नाईट।

फिल्म का निर्देशन जयप्रकाश कर रहे हैं जिन्होंने इसके पहले साजन की बाहों में, मनचला, सौदा, मार्केट तथा अन्य कई चर्चित फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया है। उन्होंने बताया कि, फिल्म की ५० फीसदी शूटिंग पूरी हो चुकी हैं और जल्द ही आगे की शूटिंग के लि १५ दिन का शेड्यूल लेकर हम गोवा जाने वाले हैं। गोवा में हम रेव पार्टी का दृश्य फिल्माने वाले हैं। इसके अलावा और भी कई नाटकीय दृश्य फिल्माए जाने वाले हैं।

निर्माता-निर्देशक- जयप्रकाश
लेखक- मिराक मिर्जा
कैमरा- प्रेम निग्गू
गीत- संदीप नाथ
संगीत- अंकित तिवारी
कलाकार- आरिफ झकेरिया (एसीपी ढोबले), अमन वर्मा, माही खंडुरी, शीतल शाह, नासीर अब्दुल्ला, विपुल कपिल, मुश्ताक खान, स्मिता जयकर, गणेश जाधव,अश्विन कौशल और विश्वजीत प्रधान।

मंगलवार, अगस्त 28, 2012

फिजा के जीवन की 'जरा सी लाइफ'

- अतुल कुशवाह

किसी शायर ने लिखा है जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या होगा किसने जाना। शायद यह गाना फिल्म के निर्माता प्रकाश झवेरी ने बार.बार गुनगुनाया होगा, इसीलिए उन्होंने अपनी नई फिल्म का नाम जरा सी लाइफ रखा। प्रकाश झवेरी का मानना है कि सौ बरस की जिंदगी से अच्छे है प्यार के दो चार पल। आपने जिंदगी कितनी गुजारी, इस पर उनका भरोसा नहीं है, आपने कैसे गुजारी यह बहुत जरूरी है। इसीलिए प्रकाश झवेरी ने अपनी नई फिल्म जरा सी जिंदगी की शूटिंग पूर्णता के निकट कर ली है। और फिल्म का आखरी शेड्यूल जल्द ही पूरा होने वाला है। फिल्म के निर्देशक अशोक जमुआर के अनुसार यह फिल्म जब प्रदर्शित होगी और दर्शक जब सिनेमाघर से बाहर निकलेगा तो जिंदगी की सच्चाई से वह वाकिफ हो चुका होगा। उन्होंने आगे बताया किए यह फिल्म एक ऐसे चरित्र के आसपास घूम रही है, जिसकी जिंदगी के आखरी चंद दिन बचे हुए है और वह आखरी चंद दिन कैसे कटते है, वह इस फिल्म में दिखाया गया है, इसलिए फिल्म का नाम जरा सी लाईफ है। इस फिल्म का प्रमोशनल वीडियो हाल ही में मुंबई के होटल बावा कॉन्टिनेन्टल में प्रदर्शित किया गया। इस वीडियो की खास बात यह थी कि इस प्रमोशनल वीडियो में हिंदुस्तान के जाने माने युवा संगीतकार.गायक हर्षित सक्सेना और पहली बार रुपहले परदे पर कदम रख रही मृण्मयी कोलवलकर पर फिल्माया गया है। हर्षित ने ही इस गाने को गाया जिसे संगीत दिया है निखिल ने। हमारे पूछने पर हर्षित ने बताया किए इस गाने की शूटिंग पंचगनी और महाबलेश्वर के आसपास के इलाके में की गई है। हर्षित ने अपने कैरिअर के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस इंडस्ट्री में उन्होंने कई पड़ाव पार किए हैं। वाँइस ऑफ इंडियाए म्यूजिक का महामुकाबला और जो जीता वही सुपरस्टार में काम किया। मैं उन खुशनसीब लोगों में से हूं जो इन तीनों शो में दूसरे नंबर पर आया, लेकिन आज मैं काम के मामले में नंबर वन पर हूं। मेरा पहला ही गाना मर्डर २ में गाया और संगीतबद्ध किया. हाल ए दिल चार्टबस्टर में पहले नंबर पर रहा। इसके लिए मैं विशेष फिल्म्स और खास कर महेश और मुकेश भट्ट का ताउम्र शुक्रगुजार रहूंगा। मैंने फराह खान की अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म तीस मार खां में भी गाना गाया। विक्रम भट्ट की हेट स्टोरी में भी मैंने संगीत दिया है और गाना भी गाया है। फिल्म में फिजा का किरदार निभा रही मृण्मयी कोलवलकर महाराष्ट्रीयन परिवार से है। पुणे में कई सौंदर्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाली मृण्मयी मिस पुणे रह चुकी हैं। मिस पुणे बनने के बाद उसने मॉडेलिंग शुरु की। अक्षय खन्ना के साथ दिनेश शूटिंग और लॉरियल के लिए प्रिंट विज्ञापन करने के बाद उसने राहुल के स्वयंवर में हिस्सा लिया था और अब वह रुपहले परदे पर कदम रख रही है। उसने बतायाए यह मेरी पहली फिल्म है और मैं इसमें फिजा का किरदार निभा रही हूं। मुझे उम्मीद है कि मेरी यह फिल्म दर्शकों को अवश्य पसंद आएगी। जरा सी लाईफ का निर्माण प्रकाश झवेरी और पिंकी श्रीवास्तव ने किया है। फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद आलोक श्रीवास्तव ने लिखे हैं। संगीत दिया है निखिल कामत ने। फिल्म के प्रचारक है राजू कारिया।

शुक्रवार, मई 25, 2012

चलो इक बार फिर से...


हैलो फैंड्स, यह फोटो दस दिन पुराना है। आज शेयर कर रहा हूं। खास बात यह है कि जिस दिन यह फोटो लिया गया था, उसी दिन मैंने शादी संबंध में एक लड़की भी मां के कहने पर देखी थी। फिलहाल इस जगह मेरे साथ मेरे मित्र और भाई विजय सक्सेना, कजिन दारा और मैं। ये दोनों ही फिल्म कलाकार हैं और फिल्म निर्माता भी।

बुधवार, मई 02, 2012

PRALAY…..The Beginning Of End

When woman and nature are oppressed beyond limit
“It is a journey of a innocent woman who is oppressed by men” -says Chandrapal Singh
        There is a popular saying that when the going goes tough, the tough gets going. Time and again, when women and nature is oppressed by men, they had to face its wrath and fury. Two dynamic people: producer Chandrapal Singh (owner of S. Video Broadcast Pvt. Ltd. (Pictures) and writer-director Jasbir Bijendar Bhati have joined hands to reveal this theory in the entertainment format. Titled as Pralay….The Beginning of End, the film delves as to how the people exploit the poor for their basic amenities. In simpler words, be it “Roti”, “Kapada” aur “Makan”, it is the downtrodden and those daily under-paid laborers across the nation who is exploited till the hilt. New find Masha Pour plays the main protagonist with Raghubir Yadav and above all Aditya Panscholi. A tete-a-tete with the vibrant filmmakers: Chandrapal Singh and Jasbir Bijendar Bhati. Aditya Panscholi and Shakti Kapoor too join in and share their views. Excerpts:

CHANDRAPAL SINGH
(Producer)

Chandrapal Singh has been a movie buff since his tender age. He has been keenly watching serials like Ramayan, Mahabharat and Krishna. Having started off as an equipment supplier in 2001 with post-production suites, he ventured into filmmaking with Lakeer Ka Fakeer, a film on the lives of underworld.

The script of Pralay…. brought him back memories of devotional epic dramas. The tsunami also had an adverse affect. Though our country has completed more than 62 years of independence, the rich has always dominated the poor. The subject instantly clicked his brain and finally Pralay was born.

Highlighting the film, Chandrapal Singh further says, “It is a journey of a innocent woman who is betrayed and what happens after that is what the film is all about.”

“The script needed actual locations and we shot 45 kms interior from the main Gorakhpur city 45 Days Shooting schedule at Bana Kata. We have shot on the banks of Sarju. We did erect a few sets,” confided Chandrapal Singh. Further I am thankful to have had a wonderful team of stars and technicians, says Singh.

“I am grateful to Aditya Panscholi, Raghubeer Yadav, Mohan Joshi, Mukesh Tiwari, Manoj Joshi, Shakti Kapoor and others for having given the natural and the best of performance.”

“Apart from hard-hitting message to the entire society, the film has all the ingredients to make it a commercial pot-boiler. It has melodious music by Sanjay Pathak including an item number, sad song, sufiyana and a happy one,” adds Chandrapal Singh.

The entire shooting of the film is complete and he is looking forward to release the film in August.


JASBIR BIJENDAR BHATI
(Writer-Director)

Jasbir Bijendar Bhati a.k.a. Jasbir Bhati with starry dreams had forayed into the entertainment industry in 2001. Having assisted Vipul Shah, Santosh Kole and Sachin Khot in their respective serials, Jasbir got his independent break as the director with Ekta Kapoor and Balaji’s in 2004 with Kkusum.. Then there was no looking back and had directed around 4000 episodes which includes soap operas like Kavyanjali, Kahani Ghar Ghar Ki, Kasauti, Kahin To Hoga amongst others. He had even directed Dheeraj Kumar’s Maika and Bhabhi for U.T.V. Shobha Somnath was his last stint as the director for the small screen where he met producer Chandrapal Singh. It was a blessing in disguise for the director who was looking forward to leap on to the big screen. He had this story idea and Chandrapal instantly took a liking for this unusual story and things began to roll.

Speaking about the film he says that the film has lot of contemporaries. It has religion, the poor and downtrodden, the outcaste, the fury, the anger and the violent end.

He further adds that the film revolves around an odd-couple: The 40-year-old middle-aged Raghubeer Yadav and his 20-year-old young wife played by new find Masha Pour. Then there are the five-villainous character – Shakti Kapoor, Mohan Joshi, Mukesh Tiwari, Manoj Joshi and Sitaram Panchal who considers themselves the rulers and dominating kind.

Every bad has to come to an end. Here Aditya Panscholi who plays a cop comes to the rescue of the poor and gives them justice. It was a wonderful experience for the director.

ADITYA PANSCHOLI:

“I play an honest cop in the film. My characters’ name is Swatantra Bhartiya,” says Aditya. He further says, “My role was interesting and it was something I have never tried before. I had to look like a normal citizen and at the same time be a Samaritan to the poor. It was challenging too. Further to it, for the first time I have ever shot in the actual locales of Gorakhpur village. I am happy to be a part of this team.”

SHAKTI KAPOOR:

“I play a doctor in the film. I am a part of the negative characters played by Mohan Joshi who plays a Chaudhary; Mukesh Tiwari who is the manager at the brick factory, Manoj Joshi is a grocer - banya and Sitaram Panchal is a Pandit,” says Shakti Kapoor. He further adds, “We all gang up and are besotted by the beauty of Masha Pour. We fulfill her needs for sexual favours.”

Shakti is happy playing the role as he did not had to go for malicious disguises or twist his tongues when he had to utter his dialogue. All in all it was an different experience working with the unit.